'...खनन पट्टा धारकों के पक्ष में कोई आदेश पारित नहीं करेंगे', अरावली विवाद पर बोला सुप्रीम कोर्ट
अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला में खनन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (15 मई, 2026) को कहा कि वह खनन पट्टा धारकों के पक्ष में फिलहाल कोई आदेश पारित नहीं करेगा. कोर्ट ने कहा कि उसे अरावली पहाड़ियों को लेकर काफी चिंताजनक प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं इसलिए वह अभी कोई आदेश पारित नहीं करेगा.
देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (CJI Surya Kant) और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने शुक्रवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध मामले का उल्लेख किए जाने पर कहा, 'हम इस मामले की टुकड़ों में सुनवाई नहीं करेंगे. जब तक हम पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो जाते, तब तक किसी भी गतिविधि की अनुमति नहीं देंगे.'
सुप्रीम कोर्ट 'अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा और संबंधित मुद्दे' शीर्षक से स्वतः संज्ञान लेते हुए एक मामले की सुनवाई कर रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में विशेष पारिस्थितिकीय मुद्दे जुड़े हुए हैं. फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय और अन्य पक्षकारों से अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला की परिभाषा तय करने के लिए एक समिति बनाने के लिए संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञों के नाम सुझाने को कहा था.
सीजेआई सूर्यकांत की बेंच ने मामले का उल्लेख करने वाले वकील से कहा कि अगर किसी खनन पट्टे को रद्द किया जाता है, तो संबंधित पक्ष उसे चुनौती दे सकता है. बेंच ने कहा, 'हम अभी खनन पट्टा धारकों के पक्ष में कोई आदेश पारित नहीं करेंगे. यह एक संवेदनशील मामला है.'
सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को अरावली पहाड़ियों और पर्वतमाला की एक समान परिभाषा स्वीकार करते हुए दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में इसके दायरे में आने वाले क्षेत्रों में विशेषज्ञों की रिपोर्ट आने तक नए खनन पट्टे देने पर रोक लगा दी थी. कोर्ट ने दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत शृंखला की सुरक्षा के लिए इसकी परिभाषा को लेकर मंत्रालय की समिति की सिफारिशों को स्वीकार किया था.
समिति ने सिफारिश की थी कि अरावली पहाड़ी उस भू-आकृति को माना जाए, जिसकी ऊंचाई निर्धारित अरावली जिलों में स्थानीय भू-स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक हो, जबकि अरावली पर्वतमाला ऐसी दो या अधिक पहाड़ियों का समूह होगा, जो एक-दूसरे से 500 मीटर के भीतर स्थित हों.
सुप्रीम कोर्ट ने 29 दिसंबर को अरावली की नई परिभाषा को लेकर उठे विरोध का संज्ञान लेते हुए 20 नवंबर के अपने आदेश को स्थगित कर दिया था, जिसमें पहाड़ियों और पर्वतमाला की एक समान परिभाषा स्वीकार की गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने सभी खनन गतिविधियों पर भी रोक लगा दी थी.
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि गंभीर अस्पष्टताओं को दूर करने की जरूरत है, जिनमें यह सवाल भी शामिल है कि 100 मीटर ऊंचाई और पहाड़ियों के बीच 500 मीटर की दूरी का मानदंड कहीं पर्वतमाला के बड़े हिस्से को पर्यावरणीय संरक्षण से वंचित तो नहीं कर देगा.
पीठ ने कहा था, ‘‘पर्यावरणविदों के बीच भारी आक्रोश देखने को मिला है. उन्होंने नयी परिभाषा और अदालत के निर्देशों की संभावित गलत व्याख्या और अनुचित क्रियान्वयन को लेकर गहरी चिंता जताई है.’’
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