'मासिक धर्म को कलंक की तरह समझा जाता है...', सबरीमाला मंदिर मामले में तीखी बहस, SC बोला- ये भक्त के नजरिए पर...

May 13, 2026 - 12:14
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'मासिक धर्म को कलंक की तरह समझा जाता है...', सबरीमाला मंदिर मामले में तीखी बहस, SC बोला- ये भक्त के नजरिए पर...

सबरीमाला मंदिर मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (11 मई, 2026) को कहा कि मासिक धर्म वर्जना या कलंक है, अगर आपको उसको उस नजरिए से देखते हैं. सवाल ये है कि आप इसे किस नजरिए से देखते हैं. कोर्ट ने उस वक्त यह टिप्पणी की जब एक वकील ने कोर्ट में कहा कि अक्सर मासिक धर्म को वर्जना या कलंक के रूप में देखा जाता है.

पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार मामले में एक हस्तक्षेपकर्ता की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट विजय हंसारिया ने कहा कि सबरीमाला मंदिर के संदर्भ में महिलाओं को प्रवेश से रोकने का आधार उनके मासिक धर्म की उम्र है. उन्होंने कहा, 'मान लीजिए मैं 10 साल की लड़की हूं और अपने परिवार के साथ (सबरीमाला मंदिर) जा रही हूं... मासिक धर्म को अक्सर एक वर्जना और कलंक के रूप में देखा जाता है.' इस पर जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी की, 'यह वर्जना तब है अगर आप इसे उसी नजरिए से देखते हैं. सवाल यह है कि आप इसे कैसे देखते हैं, एक ‘भक्त’ इसे कैसे देखता है... न कि एक गैर-भक्त कैसे देखता है.'

विजय हंसारिया ने दलील दी कि अगर सरकार की तरफ से कोई सामाजिक कल्याण कानून बनाया जाता है, तो उसे बरकरार रखा जाना चाहिए और उसे किसी धार्मिक प्रथा के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि संविधान निर्माताओं ने समाज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए कानून बनाए थे और नौ-सदस्यीय संविधान पीठ इसे ’उलट’ नहीं सकती.

14वें दिन की सुनवाई में केरल सरकार की ओर से सीनियर एडवोकेट जयदीप गुप्ता ने दलील दी कि सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म के मूल पहलुओं को हटाया नहीं जा सकता. उन्होंने कहा, 'हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पहलू पवित्र स्थलों पर पूजा का अधिकार है. यह पूजा पवित्र स्थलों पर ही की जाती है और अगर इसे खत्म किया जाता है यह उनके (हिंदू धर्म के अनुयायियों के) अधिकारों का उल्लंघन होगा.' जस्टिस नागरत्ना ने उनकी दलील पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, 'समाज सुधार के नाम पर संविधान के अनुच्छेद 25(1) के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं किया जा सकता.'

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जस्टिस सूर्यकांत ने इस पर कहा, 'अगर इस देश के लोग अपने निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से एक स्वर में यह मांग करते हैं कि इस मुद्दे पर सामाजिक सुधार की आवश्यकता है, तो संभवतः अदालत इसे सामाजिक सुधार के रूप में स्वीकार करेगी, लेकिन अगर यह लोगों की इच्छा और सहमति के खिलाफ है, उनपर कुछ थोपा जाता है या उन्हें चुप कराने के नियम की तरह इस्तेमाल किया जाता है, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है.'

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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान बेंच केरल के सबरीमाला मंदिर समेत विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही थी. यह बेंच धार्मिक स्वतंत्रता के विभिन्न पहलुओं पर विचार कर रही है, जिनमें दाऊदी बोहरा समुदाय से संबंधित मुद्दे भी शामिल हैं.

संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश के अलावा जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रशांत बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची भी शामिल हैं.aa

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