'कहानी' से 'राज़ी' तक, इन एक्ट्रेसेस ने बदल दिया हिंदी सिनेमा का परिभाषा

Mar 7, 2026 - 18:47
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'कहानी' से 'राज़ी' तक, इन एक्ट्रेसेस ने बदल दिया हिंदी सिनेमा का परिभाषा

पिछले एक दशक में विशेष रूप से महिलाओं के किरदारों को लेकर भारतीय सिनेमा में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है. अब वह दौर धीरे-धीरे पीछे छूट रहा है जब फिल्मों में महिला पात्र केवल सहायक भूमिका तक सीमित होती थीं. अब ऐसी कहानियां सामने आ रही हैं, जहां महिलाएं  मजबूत, जटिल और अपनी पहचान के साथ कहानी की मुख्य नायिका हैं. फिलहाल इस बदलाव को आगे बढ़ाने में कई अभिनेत्रियों का अहम योगदान रहा है, जिन्होंने परंपराओं को चुनौती देने वाले किरदार चुने और कहानी कहने के तरीके को नया रूप दिया.

इस बदलाव की शुरुआत करने वालों में सबसे प्रभावशाली नाम विद्या बालन का है, जिन्होंने 'कहानी', 'द डर्टी पिक्चर' और 'तुम्हारी सुलु' जैसी फिल्मों के जरिए यह साबित किया कि मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा में महिला किरदार भी पूरी फिल्म को अपने दम पर संभाल सकती हैं. उनके किरदार आत्मविश्वासी, वास्तविक और काफी खूबसूरत रहे, जिन्होंने दर्शकों को यह विश्वास दिलाया कि महिला-केंद्रित कहानियां भी उतनी ही सफल हो सकती हैं.

आलिया भट्ट

इस परंपरा को आगे बढ़ाया बहुमुखी प्रतिभा की धनी आलिया भट्ट ने. 'राज़ी' और 'गंगूबाई काठियावाड़ी' जैसी फिल्मों में अपने अभिनय से न सिर्फ उन्होंने भावनात्मक गहराई और ताकत दोनों को दर्शाया, बल्कि एक नई पहचान बनाते हुए यह भी दिखाया कि आज की अभिनेत्रियां बड़े पैमाने की कहानियों का नेतृत्व भी कर सकती हैं.

आलिया की तरह ही दीपिका पादुकोणे ने भी अपने करियर में मेनस्ट्रीम फिल्मों की लोकप्रियता के साथ सशक्त कहानियों के बीच संतुलन बनाए रखा है. इनमें विशेष रूप से 'पीकू' में जहां उन्होंने सहजता दिखाई, वहीं 'छपाक' में उन्होंने भावनात्मक गंभीरता दिखाते हुए ऐसे महिला किरदारों को सामने रखा, जो संवेदनशील भी हैं और मजबूत भी.

जाह्नवी कपूर

दिलचस्प बात यह है कि इन अभिनेत्रियों के साथ ही नई पीढ़ी की अभिनेत्रियां भी इस बदलते सिनेमाई परिदृश्य में अहम भूमिका निभा रही हैं और इनमें पहला नाम आता है जान्हवी कपूर का, जिन्होंने 'गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल', 'मिली' और 'गुडलक जेरी' जैसी फिल्मों के जरिए साहस और संघर्ष की कहानियों को पर्दे पर जीवित किया. इन फिल्मों में जान्हवी ने ऐसी महिलाओं के किरदार निभाए हैं, जो असाधारण परिस्थितियों का सामना करते हुए अपनी ताकत और धैर्य का प्रदर्शन करती हैं.




तापसी पन्नू

जान्हवी कपूर के साथ ही सामाजिक मुद्दों पर आधारित सिनेमा की एक मजबूत आवाज बनकर उभरी हैं तापसी पन्नू, जिन्होंने 'पिंक', 'थप्पड़' और 'रश्मि रॉकेट' जैसी फिल्मों में लैंगिक समानता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और न्याय जैसे मुद्दों को केंद्र में रखा, जिससे उनकी फिल्में पर्दे से बाहर भी चर्चा का विषय बन गईं. और फिर आती हैं कंगना राणावत, जिनकी फिल्म 'क़्वीन' आधुनिक हिंदी सिनेमा में एक मील का पत्थर साबित हुई है. इस फिल्म ने न सिर्फ दर्शकों के साथ गहरा जुड़ाव बनाया, बल्कि कंगना की छवि एक निडर और स्वतंत्र महिला के रूप में मजबूत भी की.'क़्वीन' के अलावा 'तनु वेड्स मनु' और 'मणिकर्णिका: द क़्वीन ऑफ़ झांसी' जैसी फिल्मों ने कंगना की इस पहचान को और मजबूत किया.



कृति सेनन

कृति सेनन भी ऐसी कहानियों का हिस्सा रही हैं, जहां महिला किरदार कहानी के केंद्र में होती है. विशेष रूप से फिल्म 'मिमी' में कृति ने अपने करियर के सबसे सराहे गए अभिनय में से एक दिया है, जिसमें उन्होंने एक युवा महिला के सरोगेसी से जुड़े भावनात्मक और सामाजिक पहलुओं को संवेदनशीलता के साथ दर्शाया है.


नुशरत भरुचा

इसी तरह नुशरत भरुचा ने भी ऐसी कहानियां चुनी हैं, जिनमें महिलाओं की जटिल और साहसी यात्राएं दिखाई देती हैं, जैसे 'अकेली', 'छोरी' और 'छोरी 2' जैसी फ़िल्में। इन फिल्मों में नुशरत ने डर, अन्याय और अस्तित्व की लड़ाई से जूझती महिलाओं के किरदार निभाए हैं, जो उनकी दृढ़ता और साहस को दर्शाते हैं. इसी के साथ इस बदलाव का अहम हिस्सा बनने में सान्या मल्होत्रा ने भी अहम भूमिका निभाई है. विशेष रूप से 'मिसेस' में वे एक ऐसे किरदार में नज़र आईं, जो सामाजिक अपेक्षाओं को चुनौती देते हुए आम महिलाओं की आंतरिक ताकत को उजागर करती है.

गौरतलब है कि ये सभी अभिनेत्रियां मिलकर भारतीय सिनेमा में एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतिनिधित्व कर रही हैं, जहां महिलाएं अब केवल नायक की कहानी का हिस्सा नहीं, बल्कि अपनी खुद की कहानी की नायिका बन रही हैं. इसी के साथ आज जब दर्शक ऐसी कहानियों को खुलकर स्वीकार कर रहे हैं, तो यह साफ है कि भारतीय सिनेमा के भविष्य को आकार देने में अभिनेत्रियों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण होती जा रही है. ऐसे में 'अंतराष्ट्रीय महिला दिवस' के अवसर पर उनके यह किरदार हमें याद दिलाते हैं कि जब महिलाएं कहानी का नेतृत्व करती हैं, तो सिनेमा अधिक समृद्ध, प्रामाणिक और समाज के करीब हो जाता है.

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