Mahashivratri 2026: त्रयोदशी-चतुर्दशी के संयोग में महाशिवरात्रि, देखें पूजा, मुहूर्त, कथा से जुड़ी संपूर्ण जानकारी

Feb 12, 2026 - 16:08
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Mahashivratri 2026: त्रयोदशी-चतुर्दशी के संयोग में महाशिवरात्रि, देखें पूजा, मुहूर्त, कथा से जुड़ी संपूर्ण जानकारी

Mahashivratri 2026: रविवार, 15 फरवरी को शिव पूजा का महापर्व महाशिवरात्रि है. इस पर्व पर भगवान शिव की पूजा खासतौर पर रात में करने की परंपरा है. महाशिवरात्रि को महारात्रि भी कहा जाता है, क्योंकि इस तिथि पर रात में की जाने वाली पूजा अक्षय पुण्य देने वाली मानी जाती है.

श्री लक्ष्मीनारायण एस्ट्रो सॉल्यूशन अजमेर की निदेशिका ज्योतिषाचार्या एवं टैरो कार्ड रीडर नीतिका शर्मा ने बताया कि शिवपुराण में लिखा है कि, फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि की रात भगवान शिव शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए थे. उस समय ब्रह्मा और विष्णु के बीच विवाद चल रहा था. दोनों देवताओं खुद को श्रेष्ठ बता रहे थे. इस विवाद को शांत कराने के लिए भगवान शिव शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए और इन दोनों देवताओं को अपनी महिमा बताई थी. हिंदू पंचांग के अनुसार हर साल फाल्गुन मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है.

फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाने वाली शिवरात्रि इस बार दो शुभ योगों में 15 फरवरी को सर्वार्थ सिद्धि योग में त्रियोदशी युक्त चतुर्दशी में मनाई जाएगी. महाशिवरात्रि के दिन शिवजी के भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ व्रत रखते हैं और विधि-विधान से शिव-गौरी की पूजा करते हैं. ऐसा कहा जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन भगवान भोलेनाथ पृथ्वी पर मौजूद सभी शिवलिंग में विराजमान होते हैं, इसलिए महाशिवरात्रि के दिन की गई शिव की उपासना से कई गुना अधिक फल प्राप्त होता है.

14 फरवरी को शाम 4.02 बजे त्रयोदशी शुरू होगी और 15 फरवरी को शाम 5.05 बजे तक त्रियोदशी है. 15 फरवरी को शाम 5.06 बजे चतुर्दशी शुरू होगी, जोकि 16 फरवरी को शाम 5.35 बजे तक है. इस कारण इस बार 15 फरवरी को त्रयोदशी युक्त चतुर्दशी में महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाएगा. इस दिन सुबह 7.08 से शाम 7.48 बजे तक सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है. इस दिन विधि विधान के साथ शिव लिंग की पूजा करनी चाहिए. शुभ संयोग और शुभ मुहूर्त में भगवान शिव की आराधना करने से उनके भक्तों को मनोवांछित फलों की प्राप्ति होगी.

सर्वार्थ सिद्धि योग ज्योतिष में एक अत्यंत शुभ योग माना जाता है. जिसका अर्थ है सभी इच्छाओं की पूर्ति करने वाला. यह विशेष वार (दिन) और निश्चित नक्षत्रों के संयोग से बनता है, ऐसी मान्यता है कि कार्य (जैसे व्यापार, वाहन खरीदना, खरीदारी) निश्चित रूप से सफल होता है. यह योग बाधाओं को दूर करता है और मनोवांछित फल देता है.

मार्कण्डेय पुराण में शिवरात्रि को महारात्रि कहा गया

मार्कण्डेय पुराण के श्री दुर्गा सप्तशती में तीन प्रकार की दारुण रात्रियों का उल्लेख है. इन तीन रात्रियों को कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि कहा गया है. होली का पर्व कालरात्रि के रूप में मनाया जाता है. जबकि दीपावली और शरद पूर्णिमा को मोहरात्रि का पर्व माना गया है. हालांकि कुछ विद्वान दीपावली को कालरात्रि का पर्व भी मानते हैं. शिवरात्रि को विशेष रूप से महारात्रि का कहा गया है, क्योंकि यह रात्रि साधना और भक्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है. हिंदू धर्म में अधिकतर त्योहार सूर्योदय के बाद मनाने की परंपरा है, लेकिन कुछ पर्व हैं, जिन्हें रात में मनाना चाहिए. इनमें होली, दीपावली, शरद पूर्णिमा, जन्माष्टमी, शिवरात्रि और नवरात्रि प्रमुख हैं. इन पर्वों में रात्रि का महत्व है, क्योंकि यह समय साधना, ध्यान और ईश्वर से जुड़ने के लिए श्रेष्ठ माना जाता है.

महाशिवरात्रि  तिथि

वैदिक पंचांग के अनुसार इस साल फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि रविवार 15 फरवरी को शाम 05:04 मिनट से शुरू होगी. यह चतुर्दशी तिथि 16 फरवरी को शाम 5:34 मिनट तक रहेगी. ऐसे में महाशिवरात्रि रविवार 15 फरवरी को मनाई जाएगी. महाशिवरात्रि के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग का शुभ संयोग बन रहा है. उत्तराषाढा और श्रवण नक्षत्र का शुभ संयोग बना रहेगा. व्यतीपात योग बनेगा, जो पूरे दिन रहने वाला है. कुंभ राशि में सूर्य, बुध, राहु और शुक्र का संयोग चतुर्ग्रही योग का निर्माण करेंगे.

चार प्रहर की पूजा

महाशिवरात्रि के पर्व काल में धर्म शास्त्रीय मान्यता के अनुसार चार प्रहर की साधना का विशेष महत्व है. प्रत्येक प्रहर में भगवान शिव की उपासना के अलग-अलग प्रकार का वर्णन मिलता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यथा श्रद्धा, यथा प्रहर, यथा स्थिति और यथा उपचार के अनुसार साधना करनी चाहिए. चार प्रहर की साधना से धन, यश, प्रतिष्ठा और समृद्धि प्राप्त होती है. जिनके जीवन में संतान संबंधी बाधा हो रही हो, उन्हें भी यह साधना अवश्य करनी चाहिए.

चार प्रहर की पूजा का समय

  • प्रथम प्रहर पूजा का समय: सायं 06:15 बजे से रात्रि 09:28 बजे तक
  • द्वितीय प्रहर पूजा का समय: रात्रि 09:29 बजे से मध्यरात्रि 12:41 बजे तक
  • तृतीय प्रहर पूजा का समय: मध्यरात्रि 12:42 बजे से 16 फरवरी प्रातः03:54 बजे तक
  • चतुर्थ प्रहर पूजा का समय: 16 फरवरी, प्रातः03:55 बजे से प्रातः 07:07 बजे तक

पूजा में करें महामृत्युंजय मंत्र का जप

महाशिवरात्रि पर शिव पूजा करते समय में अपनी मनोकामना के अनुसार मंत्र जप करना चाहिए. इस मंत्र के जप से अनजाना भय और चिंता दूर होती है. महामृत्युंजय मंत्र की वजह से शिव जी की विशेष कृपा मिलती है, जिससे जीवन में सुख-शांति बनी रहती है.

महामृत्युंजय मंत्र- ऊँ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिंपुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।

इन चीजों से करें भगवान शिव का अभिषेक

महाशिवरात्रि पर्व के दिन भगवान शिव की उपासना के समय शिवलिंग पर शहद से अभिषेक करना शुभ होता है. ऐसा करने से श्रद्धालु के कार्य जीवन में आ रही सभी समस्याएं दूर हो जाती है और भगवान शिव की कृपा बनी रहती है. शिवरात्रि के दिन भगवान शिव का रुद्राभिषेक दही से करने से भी आर्थिक क्षेत्र में आ रही सभी परेशानियां दूर हो जाती है. वहीं गन्ने के रस से भगवान शिव का अभिषेक करने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं. भगवान शिव का अभिषेक करते समय 108 बार 'ॐ पार्वतीपतये नमः' मंत्र का जाप करना चाहिए. ऐसा करने से जीवन में अकाल संकट नहीं आता है.

महाशिवरात्रि 2026 पूजन विधि

महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव को पंचामृत से स्नान करा कराएं. केसर के 8 लोटे जल चढ़ाएं. पूरी रात्रि का दीपक जलाएं. चंदन का तिलक लगाएं. बेलपत्र, भांग, धतूरा, गन्ने का रस, तुलसी, जायफल, कमल गट्टे, फल, मिष्ठान, मीठा पान, इत्र व दक्षिणा चढ़ाएं. सबसे बाद में केसर युक्त खीर का भोग लगा कर प्रसाद बांटें.

महाशिवरात्रि की पौराणिक कथा

शिवपुराण के मुताबिक एक बार ब्रह्मा-विष्णु के बीच विवाद हो गया. झगड़े की वजह ये थी कि दोनों ही देवता खुद को श्रेष्ठ बता रहे थे. जब दोनों देवता दिव्यास्त्रों से युद्ध शुरू करने वाले थे, ठीक उसी समय भगवान शिव लिंग रूप में इनके सामने प्रकट हो गए. शिव जी ने कहा कि आप दोनों में से जो भी इस लिंग का छोर (अंत) खोज लेगा, वही श्रेष्ठ माना जाएगा. ये बात सुनकर एक छोर की ओर ब्रह्मा जी और दूसरे छोर की ओर विष्णु जी चल दिए. बहुत समय तक ब्रह्मा-विष्णु अपने-अपने छोर की ओर आगे बढ़ते रहे, लेकिन उन्हें लिंग का अंत नहीं मिला. उस समय ब्रह्मा जी खुद को श्रेष्ठ घोषित करने के लिए एक योजना बनाई.

ब्रह्मा ने एक केतकी का पौधा लिया और उससे झूठ बोलने के लिए कहा कि वह शिव-विष्णु के सामने बोले कि ब्रह्मा जी ने लिंग का अंत खोज लिया है. ब्रह्मा केतकी के पौधे को लेकर शिव जी के पास पहुंचे, विष्णु जी भी वहां आ गए और उन्होंने कहा कि मैं इस लिंग का अंत नहीं खोज सका. ब्रह्मा ने कहा कि मैंने इस लिंग का अंत खोज लिया है, ये बात आप केतकी के पौधे से भी पूछ सकते हैं. केतकी ने भी भगवान के सामने झूठ बोल दिया. ब्रह्मा जी का झूठ सुनते ही शिव जी क्रोधित हो गए. उन्होंने कहा कि आपने झूठ कहा है, इसलिए आज से आपकी कहीं भी पूजा नहीं होगी और केतकी ने आपके झूठ में साथ दिया, इसलिए इसके फूल मेरी पूजा में वर्जित रहेंगे। इसके बाद विष्णु जी सर्वश्रेष्ठ घोषित हो गए. ये घटना फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की ही मानी जाती है, इसलिए इस तिथि पर महाशिवरात्रि पर्व मनाने की परंपरा है.

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