Explained: भारत में 'अल्पसंख्यक' का मतलब और कानून क्या है? संविधान में शब्द ही गायब, किन राज्यों में हिंदू भी माइनॉरिटी
भारत में 'अल्पसंख्यक' शब्द सुनने में भले ही छोटा लगे, लेकिन कानूनी तौर पर यह एक बहुत बड़ा और अहम मसला है. आम बोलचाल में लोग इसे सिर्फ मुसलमानों या ईसाईयों से जोड़कर देखते हैं, जबकि हकीगत इससे कहीं ज्यादा बड़ी और दिलचस्प है. अल्पसंख्यक या माइनॉरिटी शब्द का इस्तेमाल अक्सर राजनीतिकिच और सामाजिक बहसों में होता है, लेकिन इसका कानून अर्थ काफी जटिल और परतदार है. आमतौर पर लोग इसे सिर्फ धार्मिक पहचान से जोड़कर देखते हैं, जबकि भारतीय संविधान और कानूनी ढांचे में 'अल्पसंख्यक' की अवधारणा कहीं ज्यादा गहरी है.
संविधान ने 'अल्पसंख्यक' शब्द को परिभाषित नहीं किया
सबसे पहली और सबसे अहम बात जो आपको जाननी चाहिए वह यह है कि भारत का संविधान खुद अल्पसंख्यक शब्द की कोई सीधी-सादी परिभाषा नहीं देता. भारत में दो तरह के अल्पसंख्यक हैं, एक धार्मिक आधार पर और दूसरे भाषाई आधार पर. संविधान सभा में जब इस मुद्दे पर बहस हुई थी, तो डॉ. भीमराव अंबेडकर और दूसरे नेताओं ने जानबूझकर ऐसा किया. उनका तर्क था कि भारत जैसे विविधता वेला देश में अल्पसंख्यकों की कोई एक फिक्स लिस्ट नहीं बनाई जा सकती है. हालात और इलाके के हिसाब से यह बदलता रहेगा, इसलिए संविधान में परिभाषा तो नहीं दी गई, लेकिन दो अहम अनुच्छेदों के जरिए अल्पसंख्यकों के अधिकारों को मजबूती दी गई.
- अनुच्छेद 29: यह नागरिकों के किसी भी ऐसे वर्ग को संरक्षित रखने का अधिकार देता है, जिसकी अपनी अलग भाषा, लिपि या संस्कृति है. यह राज्य को यह भी निर्देश देता है कि सैक्षिक संस्थानों में प्रवेश के समय सिर्फ धर्म, मूलवंश, जाति या भाषा के आधार पर किसी नागरिक से भेदभाव नहीं किया जाएगा.
- अनुच्छेद 30: यह धार्मिक और भाषाई दोनों तरह के अल्पसंख्यकों को एक बहुत ही जरूरी अधिकार देता है. यानी उन्हें पसंद के शैक्षिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन करने का अधिकार है. यह अधिकार उनके सांस्कृतिक और शैक्षिक सुशासन तय करने के लिए है.
फिर अल्पसंख्यक तय कौन करता है?
संविधान ने जब खुद कोई सूची नहीं बनाई तो सवाल उठा कि फिर अल्पसंख्यकोचं की पहचान कैसे होगी? यह जिम्मेदारी सरकार ने 'राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) अधिनियम, 1992' के जरिए निभाई. इस कानून की धारा 2(C) कहती है कि 'अल्पसंख्यक' वह समुदाय है जिसे केंद्र सरकार राजपत्र यानी गजट में अधिसूचित करे. इसी प्रावधान के तहत केंद्र सरकार ने अब तक 6 समुदायों को राष्ट्रीय स्तर पर धार्मिक अल्पसंख्यक घोषित किया.
- मुस्लिम
- ईसाई
- सिख
- बौद्ध
- पारसी
- जैन
27 जनवरी 2014 में जैन समुदाय को यह दर्जा मिलने के बाद से यह सूची स्थिर है.
धार्मिक अल्पसंख्यक: आंकड़ों की तस्वीर
2011 की जनगणना के मुताबिक, भारत की आबादी में हिंदू 79.8% थे. मुसलमान 14.23% के साथ सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह थे. इसके बाद ईसाई 2.30%, सिख 1.72%, बौद्ध 0.70%, जैन 0.37% और पारसी 0.006% थे. कुल मिलाकर ये सभी अल्पसंख्यक समुदाय भारत की आबादी का करीब 19.3% हिस्सा बनाते थे. लेकिन यहां एक मजेदार बात है कि जम्मू-कश्मीर, पंजाब मिजोर और लक्ष्यद्वीप जैसे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हिंदू खुद अल्पसंख्यक हैं.
इसका मतलब यह हुआ कि 'अल्पसंख्यक' होना हमेशा पूरे देश के हिसाब से नहीं, बल्कि कई बार राज्य के हिसाब से भी तय होता है. यही वजह है कि कई राज्यों ने अपने यहां अलग से राज्य अल्पसंख्यक आयोग बनाए हुए हैं, जो स्थानीय स्तर पर अल्पसंख्यक आयोग के मामले देखते हैं.
भाषाई अल्पसंख्यक: एक अलग ही दुनिया
अब तक हमने सिर्फ धार्मिक अल्पसंख्यकों की बात की है, लेकिन भारत में एक और बहुत बड़ा वर्ग है- भाषाई अल्पसंख्यक. दरअसल, भारत में 22 अनुसूचित भाषाएं हैं, लेकिन हर राज्य की अपनी एक प्रमुख भाषा होती है. अगर किसी राज्य में लोगों का एक समूह ऐसी भाषा बोलता है जो उस राज्य की मुख्य भाषा से अलग है, तो वह समूह उस राज्य में 'भाषाई अल्पसंख्यक' कहलाएगा.
उदाहरण से समझें: महाराष्ट्र में रहने वाले तमिल भाषी लोग या पश्चिम बंगाल में रहने वाले हिंदी भाषी लोग भाषाई अल्पसंख्यक हैं. संविधान का अनुच्छेद 350-A के तहत एक 'विशेष भाषाई अधिकारी' भी होता है जो इन मामलों की जांच करता है.
अल्पसंख्यकों पर सुप्रीम कोर्ट का क्या कहना है?
सालों से 'अल्पसंख्यक' की परिभाषा को लेकर अदालतों में बहस होती रही है. सुप्रीम कोर्ट ने कई बड़े फैसलों में इस पर अहम रोशनी डाली है:
- टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य (2002): यह मामला अल्पसंख्यक अधिकारों के संदर्भ में एक मील का पत्थर है. 11 जजों की बेंच ने यह साफ कहा है कि अनुच्छेद 30 के तहत धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों की पहचान राज्य स्तर पर की जानी चाहिए, न कि संपूर्ण भारत के आधारत पर. इसका मतलब है कि किसी समुदाय के अल्पसंख्यक होने का निर्धारण संबंधित राज्य की जनसंख्या में उनकी हिस्सेदारी के आधार पर होगा.
- बाल पाटिल बनाम भारत संघ (2005): इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जैनियों को अल्पसंख्यक का दर्जा देने का फैसला राज्य सरकारों को करना चाहिए, केंद्र सरकार को नहीं. हालांकि, बाद में 2014 में केंद्र सरकार ने इसके बावजूद जैनियों को राष्ट्रीय स्तर पर ही अल्पसंख्यक घोषित कर दिया.
अल्पसंख्यक होने का फायदा क्या?
अल्पसंख्यक का दर्जा सिर्फ एक लेबल नहीं है, बल्कि इससे समुदायों को कई ठोस फायदे मिलते हैं:
- सबसे बड़ा फायदा अनुच्छेद 30 के तहत अपनी पसंद की शिक्षा संस्थाएं खोलने और चलाने का अधिकार है.
- केंद्र और राज्य सरकारें अल्पसंख्यक समुदायों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं चलाती हैं. जैसे- अल्पसंख्यक छात्रों के लिए स्कॉलरशिप, कौशल विकास कार्यक्रम और आर्थिक मदद.
- NCM का काम भी यही है कि वह अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करे और उनकी शिकायतों का निवारण करे.
- 2004 में गठित राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था आयोग (NCMEI) विशेष रूप से अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं के मामले देखता है.
विवादों से नहीं बचा अल्पसंख्यक मुद्दा
यह पूरी व्यवस्था विवादों से अछूती बी नहीं है. कुछ लोगों का कहना है कि धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक तय करना संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र के खिलाफ है. कुछ राज्यों की मांग है कि दिंहुओं को भी उन राज्यों में अल्पसंख्यक का दर्जा मिलना चाहिए जहां उनकी आबादी कम है. हालांकि, इस पर अभी तक कोई आम सहमति नहीं बन पाई है, लेकिन यह मांग लगातार उठ रही है.
कुल मिलाकर, भारत में अल्पसंख्यक की कोई एक और अंतिम परिभाषा नहीं है. राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र सरकार ने छह धार्मिक समुदायों को अल्पसंख्यक घोषित किया है, लेकिन राज्य स्तर पर यह सूची अलग हो सकती है. भाषाई अल्पसंख्यकों की पहचान राज्य की मुख्य भाषा के आधार पर होती है. यह पूरी व्यवस्था संविधान की उस मूल भावना पर टिकी है, जो विविधता में एकता को भारत की सबसे बड़ी ताकत मानती है.
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