Shani Dev: क्या आप जानते हैं शनि देव के गुरु कौन हैं? शिव भक्ति करने वालों को कभी क्यों नहीं सताते सूर्यपुत्र?
Shani Dev: महादेव और न्याय देवता, सनातन धर्म में शनि देव को न्याय और कर्मफल का देवता माना जाता है. अमूमन लोग शनि देव के नाम से ही भयभीत हो जाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ब्रह्मांड के सबसे क्रूर माने जाने वाले ग्रह शनि देव, स्वयं महादेव के परम भक्त और शिष्य हैं? पौराणिक कथाओं के अनुसार, शनि देव को 'न्यायधिकारी' का पद किसी और ने नहीं, बल्कि स्वयं भगवान शिव ने दिया था.
आइए जानते हैं महादेव और शनि देव के इस अनोखे संबंध की कहानी और यह भी कि आखिर क्यों शिव की भक्ति करने वालों पर शनि देव हमेशा मेहरबान रहते हैं.
1. कैसे और क्यों बने शनि देव महादेव के शिष्य?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शनि देव सूर्य देव और देवी छाया के पुत्र हैं. जन्म के समय शनि देव का रंग अत्यधिक श्याम (काला) था, जिसके कारण सूर्य देव ने उन्हें अपना पुत्र मानने से इनकार कर दिया और उनका अपमान किया. अपनी माता के अपमान और पिता के इस व्यवहार से आहत होकर शनि देव ने भगवान शिव की घोर तपस्या करने का निश्चय किया.
शनि देव ने कड़कती धूप, ठंड और बरसात की परवाह किए बिना सालों तक भूखे-प्यासे रहकर महादेव की आराधना की. उनकी इस कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा.
कर्मफल दाता का मिला पद
शनि देव ने महादेव से प्रार्थना की कि उन्हें ऐसा पद और शक्ति मिले जिससे वे अपने पिता सूर्य देव से भी अधिक शक्तिशाली और पूजनीय बनें. तब महादेव ने शनि देव को नवग्रहों में सबसे श्रेष्ठ स्थान दिया और उन्हें 'कर्मफल दाता' और 'न्यायदेव' नियुक्त किया. शिव जी ने कहा कि शनि देव केवल इंसानों को ही नहीं, बल्कि देवी-देवताओं को भी उनके कर्मों के आधार पर दंड या पुरस्कार देंगे.
2. जब शनि देव की वक्र दृष्टि से नहीं बच पाए स्वयं शिव
महादेव और शनि देव से जुड़ी एक बेहद दिलचस्प कथा है, जब शनि देव ने अपने गुरु शिव जी पर ही दृष्टि डालने की इच्छा जताई.
कथा के अनुसार, एक बार शनि देव भगवान शिव के पास पहुंचे और बोले, "हे गुरुदेव, कल मैं आपकी राशि में प्रवेश करने वाला हूँ, इसलिए मेरी वक्र दृष्टि आप पर भी पड़ेगी."
महादेव ने मुस्कुराते हुए पूछा, "तुम कितने समय के लिए मुझ पर दृष्टि डालोगे?" शनि देव ने उत्तर दिया, "सवा प्रहर (लगभग साढ़े तीन घंटे) के लिए."
शनि देव के प्रकोप से बचने के लिए महादेव ने एक युक्ति निकाली. वे अगले दिन मृत्युलोक (धरती) पर आए और एक हाथी का रूप धारण कर जंगल में छिप गए. सवा प्रहर बीतने के बाद, महादेव वापस अपने दिव्य रूप में लौटे और हंसते हुए शनि देव से बोले, "देखा शनि, तुम्हारी वक्र दृष्टि मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाई."
इस पर शनि देव ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रता से कहा, "हे प्रभु! मेरी दृष्टि का प्रभाव तो देखिए. मेरी ही दृष्टि के कारण ब्रह्मांड के स्वामी को सवा प्रहर के लिए देव योनि छोड़कर पशु योनि (हाथी) में जाना पड़ा और छिपकर रहना पड़ा." महादेव शनि देव के इस निष्पक्ष न्याय को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने शनि देव को गले लगा लिया.
3. क्यों शिव भक्तों पर हमेशा मेहरबान रहते हैं शनि देव?
ज्योतिष शास्त्र और पुराणों में स्पष्ट है कि जो व्यक्ति महादेव का सच्चा भक्त होता है, शनि देव उसे कभी परेशान नहीं करते. इसके पीछे मुख्य रूप से दो कारण हैं:
गुरु-शिष्य का संबंध: शनि देव भगवान शिव को अपना गुरु मानते हैं. सनातन परंपरा में शिष्य कभी भी अपने गुरु या उनके प्रिय भक्तों को कष्ट नहीं देता. यदि कोई शिव की आराधना करता है, तो शनि देव उस पर अपनी कुदृष्टि नहीं डालते.
कर्मों का शुद्धिकरण: शिव भक्ति से व्यक्ति के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और वह कुकर्मों (बुरे कामों) से दूर रहता है. चूंकि शनि देव केवल बुरे कर्मों का दंड देते हैं, इसलिए शिव भक्तों के अच्छे कर्मों के कारण वे हमेशा शुभ फल ही प्रदान करते हैं.
शनि दोष से मुक्ति के लिए सरल उपाय
आप शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या महादशा से परेशान हैं, तो ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भगवान शिव की शरण में जाना सबसे उत्तम मार्ग है:
शिवलिंग पर जल और बेलपत्र: प्रत्येक शनिवार को शिवलिंग पर काला तिल मिलाकर जल अर्पित करें और 'ॐ नमः शिवाय' का जप करें.
महामृत्युंजय मंत्र: प्रतिदिन या विशेषकर शनिवार को महामृत्युंजय मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करने से शनि का हर प्रकार का दोष शांत होता है.
शनि चालीसा और शिव चालीसा: शनिवार के दिन शिव और शनि दोनों की चालीसा का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना जाता है.
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