Adi Shankaracharya Jayanti 2026: सनातन धर्म के मास्टर माइंड थे आदि शंकराचार्य, जानें 4 दिशाओं में क्यों बनाए चार धाम

Apr 13, 2026 - 10:22
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Adi Shankaracharya Jayanti 2026: सनातन धर्म के मास्टर माइंड थे आदि शंकराचार्य, जानें 4 दिशाओं में क्यों बनाए चार धाम

Adi Shankaracharya Jayanti 2026: सनातन धर्म में आदि शंकराचार्य को एक महान दार्शनिक, संत और धर्म सुधारक के रूप में जाना जाता है. शंकराचार्य जयंती 21 अप्रैल 2026 को मनाई जाएगी. इस दिन आदि शंकराचार्य की 1238वीं जन्म वर्षगांठ होगी. उन्होंने उस समय हिन्दु संस्कृति को पुनर्जीवित किया, जिस समय हिन्दु संस्कृति अपने पतन की ओर अग्रसर थी. अद्वैत वेदांत का प्रचार-प्रसार किया. आदि शंकराचार्य का इतिहास, उन्होंने भारत में मठों की स्थापना क्यों की आइए जानते हैं.

कौन है आदि शंकराचार्य

आदि शंकराचार्य 8वीं शताब्दी के महान हिंदू दार्शनिक थे, जिनका जन्म केरल के कालड़ी गांव में हुआ था. उनका पूरा नाम शंकर था और उन्हें “आदि” (प्रथम) शंकराचार्य इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने शंकराचार्य परंपरा की स्थापना की. इनके पिता शिवगुरु और माता आर्याम्बा थीं, आदि शंकराचार्य बचपन से ही असाधारण बुद्धिमत्ता के धनी थे. 8 वर्ष की आयु में ही वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया. कहा जाता है कि उन्होंने बहुत छोटी उम्र में ही संन्यास ले लिया और ज्ञान की खोज में निकल पड़े.

आदि शंकराचार्य ने चारों दिशाओं में क्यों की मठों की स्थापना

समाज में धार्मिक भ्रम, अलग-अलग मतों के बीच टकराव और वेदों की सही शिक्षा का अभाव के चलते और इन चुनौतियों को दूर करने के लिए मठों की स्थापना आदि शंकराचार्य का एक दूरदर्शी कदम था. आदि शंकराचार्य ने भारत के चारों दिशाओं में मठ (पीठ) केवल धार्मिक केंद्र बनाने के लिए नहीं, बल्कि सनातन धर्म की रक्षा, संगठन और ज्ञान के प्रसार के लिए स्थापित किए थे.

  1. श्रृंगेरी मठ (दक्षिण – कर्नाटक)
  2. द्वारका मठ (पश्चिम – गुजरात)
  3. पुरी मठ (पूर्व – ओडिशा)
  4. ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ) (उत्तर – उत्तराखंड)

आदि शंकराचार्य के विचार

आदि शंकराचार्य के रचित श्लोक आज भी आध्यात्मिक जीवन का मार्ग दिखाते हैं.

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः॥

अर्थ: - ब्रह्म (ईश्वर) ही सत्य है. यह संसार मिथ्या (अस्थायी) है. जीव (आत्मा) और ब्रह्म अलग नहीं हैं.

भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढ़मते. सम्प्राप्ते सन्निहिते काले न हि न हि रक्षति डुकृञ्करणे॥

अर्थ -  हे मनुष्य! भगवान गोविंद (श्रीकृष्ण) का भजन करो. केवल व्याकरण या विद्या (ज्ञान का अहंकार) तुम्हें मृत्यु के समय नहीं बचा सकती. जीवन में केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि भक्ति और ईश्वर से जुड़ाव भी आवश्यक है.

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