फिल्म ‘ओ रोमियो’ पर रोक लगाने से कोर्ट का इनकार, निर्माता-निर्देशक को मिली राहत

Feb 9, 2026 - 17:06
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फिल्म ‘ओ रोमियो’ पर रोक लगाने से कोर्ट का इनकार, निर्माता-निर्देशक को मिली राहत

विशाल भारद्वाज की फिल्म 'ओ रोमियो', जिसमें शाहिद कपूर और तृप्ति डिमरी मुख्य भूमिकाओं में हैं, को एक बड़ी कानूनी जीत मिली है. मुंबई की एक अदालत ने फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है और दिवंगत गैंगस्टर हुसैन उस्तारा की बेटी को दी गई अंतरिम राहत को भी खारिज कर दिया है, जिसने दावा किया था कि फिल्म उसके पिता के जीवन पर आधारित है.

फिल्म ‘ओ रोमियो’ पर रोक लगाने से कोर्ट का इनकार
मुंबई सिटी सिविल कोर्ट ने फिल्म ‘ओ रोमियो’ की रिलीज पर रोक लगाने की मांग को खारिज कर दिया है. कोर्ट का कहना है कि इस समय फिल्म पर रोक लगाने की कोई ठोस वजह सामने नहीं आई है. यह फैसला शनिवार को जज एच. सी. शेंडे ने सुनाया.

क्या था पूरा मामला?
याचिकाकर्ता सनौबर शेख ने कोर्ट में कहा था कि फिल्म की कहानी उनके दिवंगत पिता हुसैन शेख उर्फ हुसैन उस्तरा की जिंदगी से मिलती-जुलती है. उनका आरोप था कि बिना अनुमति उनके पिता की पहचान, निजी जिंदगी और नाम का इस्तेमाल किया गया है. उन्होंने 13 फरवरी 2026 को होने वाली फिल्म की रिलीज रोकने और पहले फिल्म दिखाने की मांग की थी.

याचिका में यह भी कहा गया था कि फिल्म के टीजर, ट्रेलर और प्रचार में ऐसे किरदार और सीन हैं, जो उनके पिता के जीवन जैसे लगते हैं. वहीं फिल्म बनाने वालों ने कोर्ट को बताया कि यह फिल्म पूरी तरह काल्पनिक है, किसी असली इंसान की कहानी नहीं है और इसमें साफ तौर पर डिस्क्लेमर भी दिया गया है.

कोर्ट ने कहा कि फिल्म को पहले ही कानूनी मंजूरी मिल चुकी है और याचिकाकर्ता ने उस मंजूरी को चुनौती नहीं दी है. कोर्ट की शुरुआती राय में यह साफ नहीं होता कि फिल्म का किरदार सीधे तौर पर याचिकाकर्ता के पिता पर आधारित है. अदालत ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति की मौत के बाद उसके नाम और निजता से जुड़े अधिकार कहां तक लागू होते हैं, यह कानून का जटिल और विकसित होता विषय है. ऐसे में तुरंत फिल्म पर रोक लगाना सही नहीं होगा. कोर्ट ने यह भी माना कि अगर किसी तरह का नुकसान होता है, तो उसकी भरपाई मुआवजे के जरिए की जा सकती है.

कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि याचिका काफी देर से दाखिल की गई और रिलीज के बिल्कुल करीब आकर रोक की मांग की गई. फिल्म को पहले दिखाने की मांग को अदालत ने अस्वीकार करते हुए कहा कि यह अदालत के जरिए सेंसरशिप लगाने जैसा होगा. आखिर में कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया और साफ किया कि इस आदेश में कही गई बातें सिर्फ शुरुआती हैं और मामले की अंतिम सुनवाई पर इनका कोई असर नहीं पड़ेगा.

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