बिहार के बाद बंगाल में भी SIR पर सियासी बवाल! चुनाव आयोग को क्यों पड़ी इसकी जरूरत? जानें सभी सवालों के जवाब

Nov 28, 2025 - 07:21
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बिहार के बाद बंगाल में भी SIR पर सियासी बवाल! चुनाव आयोग को क्यों पड़ी इसकी जरूरत? जानें सभी सवालों के जवाब

बिहार की तरह बंगाल में भी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) शुरू हो चुकी है. इस कड़ी में निर्वाचन आयोग ने कहा कि पश्चिम बंगाल की मौजूदा मतदाता सूची में लगभग 26 लाख मतदाताओं के नाम 2002 की मतदाता सूची से मेल नहीं खा रहे हैं. एक अधिकारी ने बुधवार को यह जानकारी दी. उन्होंने बताया कि राज्य की नवीनतम मतदाता सूची की तुलना पिछली एसआईआर प्रक्रिया के दौरान 2002 और 2006 के बीच अलग-अलग राज्यों में तैयार की गई सूचियों से करने पर यह विसंगति सामने आई.

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर एबीपी न्यूज ने वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया से एक्सक्लूसिव बात की. बातचीत के दौरान अनिल चमड़िया ने बिहार विधानसभा चुनाव में जारी SIR के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त से सवाल किया कि आपने इसकी शुरुआत बिहार से ही क्यों की. उन्होंने बताया कि हम सिर्फ बिहार ही नहीं बल्कि पूरे देश में SIR करवाएंगे. उनकी बात राजनीतिक दृष्टिकोण से बहुत जरूरी है. उन्होंने कहा था कि उनका लक्ष्य अगले 25-30 सालों के लिए शुद्धिकरण करना है. इसका मतलब है धार्मिक तौर पर लोगों धर्म के आधार पर अलग करना है. बिहार में भी घुसपैठियों वाला टर्म काफी इस्तेमाल किया गया था. हालांकि, ये प्रचार की भाषा है, लेकिन घुसपैठियों से जुड़ी तथ्य वाली बातें कम है.

क्यों इस्तेमाल किया गया घुसपैठिया टर्म?

अनिल चमड़िया ने कहा, ''घुसपैठिया का मतलब सीधे तौर पर सांप्रदायिक से जोड़ कर देखा जाता है. ये बंगाल में ज्यादा है. यहां सांप्रदायिक को केंद्र माना गया है. बंगाल से ही पूरी राजनीति की दिशा तय की गई है, जिसे SIR से जोड़कर देखा जा रहा है. बिहार में SIR को शुद्धिकरण के तौर पर इस्तेमाल करते हुए उन्हें हटाने की कोशिश की गई , जो अब नहीं रहे हैं. दूसरी तरह बंगाल में भी माइग्रेशन की बात है, जिसके लिए SIR का इस्तेमाल किया जा रहा है. इस केस में जो लोग मर चुके हैं उनको हटाने में किसी को भी आपत्ति नहीं होगी, लेकिन जो लोग दूसरी जगह चले गए हैं उन्हें लिस्ट से हटाएंगे. यहां पर सबसे बड़ा सवाल है कि कौन माइग्रेन करते हैं. वैसे लोग जिनके पास खाने को नहीं होता है.''

चमड़िया ने कहा, ''उन्हें काम करने के लिए दूसरी जगह जाना पड़ता है. बंगाल से जाने वाले लोग दूसरी जगहों पर ज्यादातर साफ-सफाई का काम करते हैं, जिनके खिलाफ बांग्लादेशी बोल कर पूरे देश भर में बड़े स्तर पर कैंपेन चलाया गया था. इस तरह से अगर लोगों का नाम लिस्ट से हटाया गया तो आने वाले समय में ऐसे लोगों की फेरहिस्त तैयार होगी, जो नॉन-वोटर होंगे, लेकिन उनकी नागरिकता को शंका से नजर से देखा जाएगा, क्योंकि अगर उनका नाम वोटर लिस्ट से हटा दिया गया तो कहां रहेगा उनका नाम.''
 
SIR का सिटीजनशिप से कनेक्शन

बंगाल में जारी SIR को सिटीजनशिप से भी जोड़कर देखा जा रहा है, क्योंकि NRC और CAA के दौरान इसको लेकर काफी बवाल किया गया था. बंगाल में CAA को लेकर विरोध हुआ था. इसके पीछे एक वजह ये है कि वहां के रहने वाले कई लोगों का पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में काफी आना-जाना हुआ था. असम का भी सिटीजनशिप का मामला देखा गया था. वहां तो सरकार ने कह दिया था कि जो लोग 1971 तक असम में आए हैं उन्हें ही नागरिक माना जाएगा. बंगाल में मकुआ समूह के लोगों को लेकर काफी विवाद रहा है. इन्हें छोटी जाति के लोग कहते हैं. उनकी संख्या काफी बड़ी है.

पश्चिम बंगाल में मकुआ समूह का लगभग 35 विधानसभा सीटों पर झुकाव होता है. इस तरह से जिन पार्टी के तरफ मकुआ समूह का झुकाव होता है वह पार्टी में चुनाव में जीत हासिल कर लेती है. ऐसे लोगों के साथ SIR की वजह से सबसे ज्यादा दिक्कत आ रही है. इस वजह से वे लोग लगातार विरोध प्रदर्शन कर रही है. मकुआ समाज ने बीत मंगलवार को विरोध प्रदर्शन भी किया था. इससे साफ पता चलता है कि SIR का किसी भी राज्य में स्वागत नहीं किया जा रहा है. इस मामले में वे लोग इसका विरोध कर रहे हैं, जो सबसे ज्यादा डरे हुए हैं. अपनी भविष्य को संकट में घिर हुआ देख रह हैं. इन लोगों में अधिकतर वैसे लोग है, जो सामाजिक तौर पर वंचित है.

कागजात को संभालने में दिक्कत
मुस्लिम वोटर पर वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि बंगाल में 35 फीसदी मुस्लिम वोटर है. उनका वोट चुनाव में काफी प्रभावित करता है. इस तरह से अगर छोटे जाति के वोटर और मुस्लिम को मिलाकर देखा जाए तो इनमें असुरक्षा की भावना जाग गई है. इनके पास किसी भी तरह का डॉक्यूमेंट नहीं होता है. ये दस्तावेजों को संभालकर नहीं रख पाते हैं. इसके पीछे की वजह ये है कि ये लोग रोजी-रोटी के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाते रहते हैं. रहने की स्थिति भी काफी खराब है. कभी बाढ़ आती है कभी सूखा आ जाता है. ऐसी स्थिति में भी कागज को संभालना मुश्किल है. आखिर में सबसे जरूरी बात कि आधुनिक विकास से इनका खासा संबंध नहीं रहा है, जिसकी मदद से ये किसी भी जरूरी कागजात को संभाल कर रख सके. इनकी हैसियत भी नहीं है कि ये लोग आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल कर सके.

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