गंभीर अपराध जिसे अल्लाह भी नहीं करते माफ, मिलता है जहन्नुम, जानें इस्लाम में गुनाए-ए-कबीरा का मतलब?

Jan 28, 2026 - 11:46
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गंभीर अपराध जिसे अल्लाह भी नहीं करते माफ, मिलता है जहन्नुम, जानें इस्लाम में गुनाए-ए-कबीरा का मतलब?

Gunah-e-kabira in Islam: इस्लाम धर्म के अनुसार, इंसान की जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए कुछ हदें तय की गई हैं. इन हदों को तोड़ना इस्लाम धर्म में गुनाह माना जाता है. कुछ गुनाह ऐसे भी होते हैं, जिन्हें कुरान और हदीस में संजीदा (serious)  माना गया है, जिन्हें गुनाह-ए-कबीरा के नाम से जाना जाता है.

ये अपराध न केवल इंसान की आखिरत (मृत्यु के बाद के जीवन) को खतरे में डालते हैं, बल्कि समाज में भी दिक्कत पैदा करते हैं.

इस्लाम में गुनाह-ए-कबीरा क्या हैं? इसमें कौन-कौन से नियमों का पालन करना होता है और इस्लाम इन पर क्या सजा तय करता है. मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना इफराहीम हुसैन से इन्हीं चीजों को आसान भाषा में समझने का प्रयास करते हैं. 

मौत के बाद क्या?

मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना इफराहीम हुसैन ने कहा कि, मुस्लिम समाज में कुछ ऐसे भी गुनाह बताए गए हैं, जिन्हें इस्लामिक दृष्टिकोण से बेहद गंभीर माना जाता है, इन्हें गुनाह-ए-कबीरा या गुनाह-ए-अजीम कहा जाता है.

इस्लाम के मुताबिक, ये वो गंभीर अपराध होते हैं, जिन पर अल्लाह ताला सख्ती से पेश आते हैं और इंसान बिना तौबा किए दुनिया को अलविदा कह दें तो आखिरत (मृत्यु के बाद के जीवन) में कड़ी सजा का सामना करना पड़ सकता है. यहां तक कि उस इंसान को सीधे तौर पर जहन्नुम भेज दिया जाता है. 

गुनाह-ए-कबीरा में कौन-कौन सी सजाएं आती हैं?

मौलाना इफराहीम हुसैन ने बताया कि, इस्लाम में बेहद गंभीर अपराध शिर्क है, यानी अल्लाह के समान किसी ओर को ईश्वर मानता है. अल्लाह ही केवल इबादत के काबिल है, उनके सिवा और किसी की भी इबादत करना या उसके समान किसी को समझना गुनाह-ए-कबीरा है. 

उन्होंने आगे ये भी बताया कि, इस्लाम में वालिदैन (माता-पिता) का दर्जा काफी महत्वपूर्ण है और उनकी आज्ञा न मानना भी गुनाह-ए-कबीरा में शामिल है. यतीमों (पिताहीन और मिसकीनों (अत्यंत गरीब या जरूरतमंद) लोग का हक मारना भी गुनाह-ए-कबीरा है. इसे इस्लाम में बहुत बड़ा जुर्म माना गया है. 

इसी तरह जिना करना (बिना विवाह के अवैध यौन संबंध बनाना), नाहक किसी की हत्या करना या किसी बेगुनाह की जान लेना भी गुनाह-ए-कबीरा में शामिल है. इस्लाम में गुनाहों को दो भागों में बांटा गया है. एक वो गलतियां जो अल्लाह के हकूक (अधिकार समूह) से जुड़े होते हैं.

ऐसे गुनाहों में अगर सच्चे मन के साथ इनसे तौबा करें तो अल्लाह तआला अपने बंदे को माफ कर देते हैं, क्योंकि अल्लाह माफ करने वाले हैं. 

दूसरे गुनाह वे होते हैं बंदों के हकूक से जुड़े होते हैं, इसमें किसी का हक मारना, छीना-छपटी करना, किसी असहाय का माल छीनना शामिल हैं. ऐसे गुनाह सिर्फ पश्चाताप करने से माफ नहीं होते हैं, बल्कि जब तक हकदार को उसके हक का वापस नहीं मिल जाता, उसे पूरी तरह माफी नहीं मिलती है. 

जितनी बड़ी गलती उतनी बड़ी ही सजा-इस्लाम

मौलाना इफराहीम हुसैन के अनुसार, हर गुनाह की सजा अलग होती है. किसे कितनी सजा मिलेगी, यह आखिरत में अल्लाह ही तय करेंगे. जिसका गुनाह जितना बड़ा होगा उसे उतनी ही बड़ी सजा दी जाएगी.

अगर कोई इंसान बिना तौबा किए इन गुनाहों के साथ दुनिया को अलविदा कह दें, तो उसे आखिरत में सख्त सजा दी जाती है. यहां तक कि उसे जहन्नुम भी भेजा जा सकता है. इसलिए इस्लाम में इंसान को हर समय गुनाहों से बचने की सलाह दी जाती है.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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